श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब देवताओंने बड़े आदरके साथ इस प्रकार भगवान्का स्तवन किया, तब वे अपनी स्तुति सुनकर बहुत प्रसन्न हुए तथा उनसे कहने लगे॥ ४६॥
अथैवमीडितो राजन् सादरं त्रिदशैर्हरिः।
स्वमुपस्थानमाकर्ण्य प्राह तानभिनन्दितः॥ ४६
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब देवताओंने बड़े आदरके साथ इस प्रकार भगवान्का स्तवन किया, तब वे अपनी स्तुति सुनकर बहुत प्रसन्न हुए तथा उनसे कहने लगे॥ ४६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.9.46 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 751) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/9/46/