श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.9.45

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

हंसाय दह्रनिलयाय निरीक्षकाय

कृष्णाय मृष्टयशसे निरुपक्रमाय।

सत्संग्रहाय भवपान्थनिजाश्रमाप्ता-

वन्ते परीष्टगतये हरये नमस्ते॥ ४५

haṃsāya dahranilayāya nirīkṣakāya

kṛṣṇāya mṛṣṭayaśase nirupakramāya|

satsaṃgrahāya bhavapānthanijāśramāptā-

vante parīṣṭagataye haraye namaste|| 45

अर्थ

प्रभो! आप शुद्धस्वरूप हृदयस्थित शुद्ध ज्योतिर्मय आकाश, सबके साक्षी, अनादि, अनन्त और उज्ज्वल कीर्तिसम्पन्‍न हैं। संतलोग आपका ही संग्रह करते हैं। संसारके पथिक जब घूमते-घूमते आपकी शरणमें आ पहुँचते हैं, तब अन्तमें आप उन्हें परमानन्दस्वरूप अभीष्ट फल देते हैं और इस प्रकार उनके जन्म-जन्मान्तरके कष्टको हर लेते हैं। प्रभो! हम आपको नमस्कार करते हैं॥ ४५॥

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