श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.9.50

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

स्वयं निःश्रेयसं विद्वान् न वक्‍त्यज्ञाय कर्म हि।

न राति रोगिणोऽपथ्यं वाञ्छतो हि भिषक्तमः॥ ५०

svayaṃ niḥśreyasaṃ vidvān na vaktyajñāya karma hi|

na rāti rogiṇo'pathyaṃ vāñchato hi bhiṣaktamaḥ|| 50

अर्थ

जो पुरुष मुक्तिका स्वरूप जानता है, वह अज्ञानीको भी कर्मोंमें फँसनेका उपदेश नहीं देता—जैसे रोगीके चाहते रहनेपर भी सद्वैद्य उसे कुपथ्य नहीं देता॥ ५०॥

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