श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.9.25

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

य एक ईशो निजमायया नः

ससर्ज येनानु सृजाम विश्‍वम्।

वयं न यस्यापि पुरः समीहतः

पश्याम लिङ्गं पृथगीशमानिनः॥ २५

ya eka īśo nijamāyayā naḥ

sasarja yenānu sṛjāma viśvam|

vayaṃ na yasyāpi puraḥ samīhataḥ

paśyāma liṅgaṃ pṛthagīśamāninaḥ|| 25

अर्थ

उन्हीं प्रभुने अद्वितीय होनेपर भी अपनी मायासे हमारी रचना की और उन्हींके अनुग्रहसे हमलोग सृष्टिकार्यका संचालन करते हैं। यद्यपि वे हमारे सामने ही सब प्रकारकी चेष्टाएँ कर-करा रहे हैं, तथापि ‘हम स्वतन्त्र ईश्‍वर हैं’—अपने इस अभिमानके कारण हमलोग उनके स्वरूपको देख नहीं पाते॥ २५॥✎ 519 520

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #519 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #520 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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