उन्हीं प्रभुने अद्वितीय होनेपर भी अपनी मायासे हमारी रचना की और उन्हींके अनुग्रहसे हमलोग सृष्टिकार्यका संचालन करते हैं। यद्यपि वे हमारे सामने ही सब प्रकारकी चेष्टाएँ कर-करा रहे हैं, तथापि ‘हम स्वतन्त्र ईश्वर हैं’—अपने इस अभिमानके कारण हमलोग उनके स्वरूपको देख नहीं पाते॥ २५॥✎ 519520
य एक ईशो निजमायया नः
ससर्ज येनानु सृजाम विश्वम्।
वयं न यस्यापि पुरः समीहतः
पश्याम लिङ्गं पृथगीशमानिनः॥ २५
उन्हीं प्रभुने अद्वितीय होनेपर भी अपनी मायासे हमारी रचना की और उन्हींके अनुग्रहसे हमलोग सृष्टिकार्यका संचालन करते हैं। यद्यपि वे हमारे सामने ही सब प्रकारकी चेष्टाएँ कर-करा रहे हैं, तथापि ‘हम स्वतन्त्र ईश्वर हैं’—अपने इस अभिमानके कारण हमलोग उनके स्वरूपको देख नहीं पाते॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.9.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 746) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/9/25/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)