॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.9.26
यो नः सपत्नैर्भृशमर्द्यमानान्
देवर्षितिर्यङ्नृषु नित्य एव।
कृतावतारस्तनुभिः स्वमायया
कृत्वाऽऽत्मसात् पाति युगे युगे च॥ २६
yo naḥ sapatnairbhṛśamardyamānān
devarṣitiryaṅnṛṣu nitya eva|
kṛtāvatārastanubhiḥ svamāyayā
kṛtvā''tmasāt pāti yuge yuge ca|| 26
अर्थ
वे प्रभु जब देखते हैं कि देवता अपने शत्रुओंसे बहुत पीड़ित हो रहे हैं, तब वे वास्तवमें निर्विकार रहनेपर भी अपनी मायाका आश्रय लेकर देवता, ऋषि, पशु-पक्षी और मनुष्यादि योनियोंमें अवतार लेते हैं, तथा युग-युगमें हमें अपना समझकर हमारी रक्षा करते हैं॥ २६॥