॥ श्रीहरिः ॥
मघवन्निदमाख्यातं वर्म नारायणात्मकम्।
विजेष्यस्यञ्जसा येन दंशितोऽसुरयूथपान्॥ ३५
maghavannidamākhyātaṃ varma nārāyaṇātmakam|
vijeṣyasyañjasā yena daṃśito'surayūthapān|| 35
अर्थ
देवराज इन्द्र! मैंने तुम्हें यह नारायणकवच सुना दिया। इस कवचसे तुम अपनेको सुरक्षित कर लो। बस, फिर तुम अनायास ही सब दैत्य-यूथपतियोंको जीत लोगे॥ ३५॥
मघवन्निदमाख्यातं वर्म नारायणात्मकम्।
विजेष्यस्यञ्जसा येन दंशितोऽसुरयूथपान्॥ ३५
देवराज इन्द्र! मैंने तुम्हें यह नारायणकवच सुना दिया। इस कवचसे तुम अपनेको सुरक्षित कर लो। बस, फिर तुम अनायास ही सब दैत्य-यूथपतियोंको जीत लोगे॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.8.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 743) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/8/35/