श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.8.33

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान् हरिः।

पातु सर्वैः स्वरूपैर्नः सदा सर्वत्र सर्वगः॥ ३३

tenaiva satyamānena sarvajño bhagavān hariḥ|

pātu sarvaiḥ svarūpairnaḥ sadā sarvatra sarvagaḥ|| 33

अर्थ

जो लोग ब्रह्म और आत्माकी एकताका अनुभव कर चुके हैं, उनकी दृष्टिमें भगवान्का स्वरूप समस्त विकल्पों—भेदोंसे रहित है; फिर भी वे अपनी माया-शक्तिके द्वारा भूषण, आयुध और रूप नामक शक्तियोंको धारण करते हैं, यह बात निश्चितरूपसे सत्य है। इस कारण सर्वज्ञ, सर्वव्यापक भगवान् श्रीहरि सदा-सर्वत्र सब स्वरूपोंसे हमारी रक्षा करें॥ ३२-३३॥

यह अर्थ श्लोक 32–33 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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