श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.8.32

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

यथैकात्म्यानुभावानां विकल्परहितः स्वयम्।

भूषणायुधलिङ्गाख्या धत्ते शक्तीः स्वमायया॥ ३२

yathaikātmyānubhāvānāṃ vikalparahitaḥ svayam|

bhūṣaṇāyudhaliṅgākhyā dhatte śaktīḥ svamāyayā|| 32

अर्थ

जो लोग ब्रह्म और आत्माकी एकताका अनुभव कर चुके हैं, उनकी दृष्टिमें भगवान्का स्वरूप समस्त विकल्पों—भेदोंसे रहित है; फिर भी वे अपनी माया-शक्तिके द्वारा भूषण, आयुध और रूप नामक शक्तियोंको धारण करते हैं, यह बात निश्चितरूपसे सत्य है। इस कारण सर्वज्ञ, सर्वव्यापक भगवान् श्रीहरि सदा-सर्वत्र सब स्वरूपोंसे हमारी रक्षा करें॥ ३२-३३॥

यह अर्थ श्लोक 32–33 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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