जिन्हें सन्तान हो गयी हो, उन सत्पुत्रोंका भी सबसे बड़ा धर्म यही है कि वे अपने पिता तथा अन्य गुरुजनोंकी सेवा करें। फिर जो ब्रह्मचारी हैं, उनके लिये तो कहना ही क्या है॥ २८॥
पुत्राणां हि परो धर्मः पितृशुश्रूषणं सताम्।
अपि पुत्रवतां ब्रह्मन् किमुत ब्रह्मचारिणाम्॥ २८
जिन्हें सन्तान हो गयी हो, उन सत्पुत्रोंका भी सबसे बड़ा धर्म यही है कि वे अपने पिता तथा अन्य गुरुजनोंकी सेवा करें। फिर जो ब्रह्मचारी हैं, उनके लिये तो कहना ही क्या है॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.7.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 737) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/7/28/