श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.7.27

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

देवा ऊचुः

वयं तेऽतिथयः प्राप्ता आश्रमं भद्रमस्तु ते।

कामः सम्पाद्यतां तात पितॄणां समयोचितः॥ २७

vayaṃ te'tithayaḥ prāptā āśramaṃ bhadramastu te|

kāmaḥ sampādyatāṃ tāta pitṝṇāṃ samayocitaḥ|| 27

अर्थ

देवताओंने कहा—बेटा विश्‍वरूप! तुम्हारा कल्याण हो। हम तुम्हारे आश्रमपर अतिथिके रूपमें आये हैं। हम एक प्रकारसे तुम्हारे पितर हैं। इसलिये तुम हमलोगोंकी समयोचित्त अभिलाषा पूर्ण करो॥ २७॥

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