श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.5.26

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

तदुपस्पर्शनादेव विनिर्धूतमलाशयाः।

जपन्तो ब्रह्म परमं तेपुस्तेऽत्र महत् तपः॥ २६

tadupasparśanādeva vinirdhūtamalāśayāḥ|

japanto brahma paramaṃ tepuste'tra mahat tapaḥ|| 26

अर्थ

शबलाश्वोंने वहाँ जाकर उस सरोवरमें स्नान किया। स्नानमात्रसे ही उनके अन्तःकरणके सारे मल धुल गये। अब वे परब्रह्मस्वरूप प्रणवका जप करते हुए महान् तपस्यामें लग गये॥ २६॥✎ 513

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #513 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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