श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.5.27

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

अब्भक्षाः कतिचिन्मासान् कतिचिद्वायुभोजनाः।

आराधयन् मन्त्रमिममभ्यस्यन्त इडस्पतिम्॥ २७

abbhakṣāḥ katicinmāsān katicidvāyubhojanāḥ|

ārādhayan mantramimamabhyasyanta iḍaspatim|| 27

अर्थ

कुछ महीनोंतक केवल जल और कुछ महीनोंतक केवल हवा पीकर ही उन्होंने ‘हम नमस्कारपूर्वक ओंकारस्वरूप भगवान् नारायणका ध्यान करते हैं, जो विशुद्धचित्तमें निवास करते हैं सबके अन्तर्यामी हैं तथा सर्वव्यापक एवं परमहंसस्वरूप हैं।’—इस मन्त्रका अभ्यास करते हुए मन्त्राधिपति भगवान्‌की आराधना की॥ २७-२८॥✎ 513

यह अर्थ श्लोक 27–28 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #513 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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