कुछ महीनोंतक केवल जल और कुछ महीनोंतक केवल हवा पीकर ही उन्होंने ‘हम नमस्कारपूर्वक ओंकारस्वरूप भगवान् नारायणका ध्यान करते हैं, जो विशुद्धचित्तमें निवास करते हैं सबके अन्तर्यामी हैं तथा सर्वव्यापक एवं परमहंसस्वरूप हैं।’—इस मन्त्रका अभ्यास करते हुए मन्त्राधिपति भगवान्की आराधना की॥ २७-२८॥✎ 513
यह अर्थ श्लोक 27–28 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
अब्भक्षाः कतिचिन्मासान् कतिचिद्वायुभोजनाः।
आराधयन् मन्त्रमिममभ्यस्यन्त इडस्पतिम्॥ २७
कुछ महीनोंतक केवल जल और कुछ महीनोंतक केवल हवा पीकर ही उन्होंने ‘हम नमस्कारपूर्वक ओंकारस्वरूप भगवान् नारायणका ध्यान करते हैं, जो विशुद्धचित्तमें निवास करते हैं सबके अन्तर्यामी हैं तथा सर्वव्यापक एवं परमहंसस्वरूप हैं।’—इस मन्त्रका अभ्यास करते हुए मन्त्राधिपति भगवान्की आराधना की॥ २७-२८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.5.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 727) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/6/5/27/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)