श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.5.25

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

तेऽपि पित्रा समादिष्टाः प्रजासर्गे धृतव्रताः।

नारायणसरो जग्मुर्यत्र सिद्धाः स्वपूर्वजाः॥ २५

te'pi pitrā samādiṣṭāḥ prajāsarge dhṛtavratāḥ|

nārāyaṇasaro jagmuryatra siddhāḥ svapūrvajāḥ|| 25

अर्थ

वे भी अपने पिता दक्षप्रजापतिकी आज्ञा पाकर प्रजासृष्टिके उद्देश्यसे तप करनेके लिये उसी नारायणसरोवरपर गये, जहाँ जाकर उनके बड़े भाइयोंने सिद्धि प्राप्त की थी॥ २५॥✎ 513

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #513 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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