परीक्षित्! हर्यश्वोंने एक मतसे यही निश्चय किया और नारदजीकी परिक्रमा करके वे उस मोक्षपथके पथिक बन गये, जिसपर चलकर फिर लौटना नहीं पड़ता॥ २१॥
इति व्यवसिता राजन् हर्यश्वा एकचेतसः।
प्रययुस्तं परिक्रम्य पन्थानमनिवर्तनम्॥ २१
परीक्षित्! हर्यश्वोंने एक मतसे यही निश्चय किया और नारदजीकी परिक्रमा करके वे उस मोक्षपथके पथिक बन गये, जिसपर चलकर फिर लौटना नहीं पड़ता॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.5.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 727) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/5/21/