श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.5.20

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

शास्त्रस्य पितुरादेशं यो न वेद निवर्तकम्।

कथं तदनुरूपाय गुणविश्रम्भ्युपक्रमेत्॥ २०

śāstrasya piturādeśaṃ yo na veda nivartakam|

kathaṃ tadanurūpāya guṇaviśrambhyupakramet|| 20

अर्थ

शास्त्र ही पिता है; क्योंकि दूसरा जन्म शास्त्रके द्वारा ही होता है और उसका आदेश कर्मोंमें लगना नहीं, उनसे निवृत्त होना है। इसे जो नहीं जानता, वह गुणमय शब्द आदि विषयोंपर विश्वास कर लेता है। अब वह कर्मोंसे निवृत्त होनेकी आज्ञाका पालन भला कैसे कर सकता है?’॥ २०॥

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