श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.5.22

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

स्वरब्रह्मणि निर्भातहृषीकेशपदाम्बुजे।

अखण्डं चित्तमावेश्य लोकाननुचरन्मुनिः॥ २२

svarabrahmaṇi nirbhātahṛṣīkeśapadāmbuje|

akhaṇḍaṃ cittamāveśya lokānanucaranmuniḥ|| 22

अर्थ

इसके बाद देवर्षि नारद स्वरब्रह्ममें—संगीतलहरीमें अभिव्यक्त हुए, भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके चरणकमलोंमें अपने चित्तको अखण्डरूपसे स्थिर करके लोक-लोकान्तरोंमें विचरने लगे॥ २२॥

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