श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.4.20

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

तमबृंहितमालोक्य प्रजासर्गं प्रजापतिः।

विन्ध्यपादानुपव्रज्य सोऽचरद् दुष्करं तपः॥ २०

tamabṛṃhitamālokya prajāsargaṃ prajāpatiḥ|

vindhyapādānupavrajya so'carad duṣkaraṃ tapaḥ|| 20

अर्थ

जब उन्होंने देखा कि वह सृष्टि बढ़ नहीं रही है, तब उन्होंने विन्ध्याचलके निकटवर्ती पर्वतोंपर जाकर बड़ी घोर तपस्या की॥ २०॥✎ 509 510

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #509 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #510 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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