जो पुरुष हृदयके उबलते हुए भयंकर क्रोधको आत्मविचारके द्वारा शरीरमें ही शान्त कर लेता है, बाहर नहीं निकलने देता, वह कालक्रमसे तीनों गुणोंपर विजय प्राप्त कर लेता है॥ १४॥✎ 507508
यः समुत्पतितं देह आकाशान्मन्युमुल्बणम्।
आत्मजिज्ञासया यच्छेत् स गुणानतिवर्तते॥ १४
जो पुरुष हृदयके उबलते हुए भयंकर क्रोधको आत्मविचारके द्वारा शरीरमें ही शान्त कर लेता है, बाहर नहीं निकलने देता, वह कालक्रमसे तीनों गुणोंपर विजय प्राप्त कर लेता है॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.4.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 718) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/4/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)