श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.4.14

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

यः समुत्पतितं देह आकाशान्मन्युमुल्बणम्।

आत्मजिज्ञासया यच्छेत् स गुणानतिवर्तते॥ १४

yaḥ samutpatitaṃ deha ākāśānmanyumulbaṇam|

ātmajijñāsayā yacchet sa guṇānativartate|| 14

अर्थ

जो पुरुष हृदयके उबलते हुए भयंकर क्रोधको आत्मविचारके द्वारा शरीरमें ही शान्त कर लेता है, बाहर नहीं निकलने देता, वह कालक्रमसे तीनों गुणोंपर विजय प्राप्त कर लेता है॥ १४॥✎ 507 508

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #507 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #508 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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