श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.4.15

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

अलं दग्धैर्द्रुमैर्दीनैः खिलानां शिवमस्तु वः।

वार्क्षी ह्येषा वरा कन्या पत्नीत्वे प्रतिगृह्यताम्॥ १५

alaṃ dagdhairdrumairdīnaiḥ khilānāṃ śivamastu vaḥ|

vārkṣī hyeṣā varā kanyā patnītve pratigṛhyatām|| 15

अर्थ

प्रचेताओ! इन दीन-हीन वृक्षोंको और न जलाइये; जो कुछ बच रहे हैं, उनकी रक्षा कीजिये। इससे आपका भी कल्याण होगा। इस श्रेष्ठ कन्याका पालन इन वृक्षोंने ही किया है, इसे आपलोग पत्नीके रूपमें स्वीकार कीजिये’॥ १५॥✎ 507 508

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #507 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #508 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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