श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.2.2

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

विष्णुदूता ऊचुः

अहो कष्टं धर्मदृशामधर्मः स्पृशते सभाम्।

यत्रादण्ड्येष्वपापेषु दण्डो यैर्ध्रियते वृथा॥ २

aho kaṣṭaṃ dharmadṛśāmadharmaḥ spṛśate sabhām|

yatrādaṇḍyeṣvapāpeṣu daṇḍo yairdhriyate vṛthā|| 2

अर्थ

भगवान्‌के पार्षदोंने कहा—यमदूतो! यह बड़े आश्‍चर्य और खेदकी बात है कि धर्मज्ञोंकी सभामें अधर्म प्रवेश कर रहा है, क्योंकि वहाँ निरपराध और अदण्डनीय व्यक्तियोंको व्यर्थ ही दण्ड दिया जाता है॥ २॥

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