इसके बाद भक्तिभावसे भरकर बड़ी नम्रतासे भगवान्को साष्टांग दण्डवत् करे। दस बार पूर्वोक्त मन्त्रका जप करे और फिर इस स्तोत्रका पाठ करे—॥ १०॥✎ 557
प्रणमेद्दण्डवद्भूमौ भक्तिप्रह्वेण चेतसा।
दशवारं जपेन्मन्त्रं ततः स्तोत्रमुदीरयेत्॥ १०
इसके बाद भक्तिभावसे भरकर बड़ी नम्रतासे भगवान्को साष्टांग दण्डवत् करे। दस बार पूर्वोक्त मन्त्रका जप करे और फिर इस स्तोत्रका पाठ करे—॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.19.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 802) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/19/10/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)