श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.18.75

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

आराध्यात्मप्रदं देवं स्वात्मानं जगदीश्‍वरम्।

को वृणीते गुणस्पर्शं बुधः स्यान्‍नरकेऽपि यत्॥ ७५

ārādhyātmapradaṃ devaṃ svātmānaṃ jagadīśvaram|

ko vṛṇīte guṇasparśaṃ budhaḥ syānnarake'pi yat|| 75

अर्थ

भगवान् जगदीश्‍वर सबके आराध्यदेव और अपने आत्मा ही हैं। वे प्रसन्‍न होकर अपने-आपतकका दान कर देते हैं। भला, ऐसा कौन बुद्धिमान् है, जो उनकी आराधना करके विषयभोगोंका वरदान माँगे। माताजी! ये विषयभोग तो नरकमें भी मिल सकते हैं॥ ७५॥

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