॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.18.75
आराध्यात्मप्रदं देवं स्वात्मानं जगदीश्वरम्।
को वृणीते गुणस्पर्शं बुधः स्यान्नरकेऽपि यत्॥ ७५
ārādhyātmapradaṃ devaṃ svātmānaṃ jagadīśvaram|
ko vṛṇīte guṇasparśaṃ budhaḥ syānnarake'pi yat|| 75
अर्थ
भगवान् जगदीश्वर सबके आराध्यदेव और अपने आत्मा ही हैं। वे प्रसन्न होकर अपने-आपतकका दान कर देते हैं। भला, ऐसा कौन बुद्धिमान् है, जो उनकी आराधना करके विषयभोगोंका वरदान माँगे। माताजी! ये विषयभोग तो नरकमें भी मिल सकते हैं॥ ७५॥