इसमें तनिक भी आश्चर्यकी बात नहीं है। क्योंकि जो मनुष्य एक बार भी आदि पुरुष भगवान् नारायणकी आराधना कर लेता है, वह उनकी समानता प्राप्त कर लेता है; फिर दितिने तो कुछ ही दिन कम एक वर्षतक भगवान्की आराधना की थी॥ ६६॥✎ 553
सकृदिष्ट्वाऽऽदिपुरुषं पुरुषो याति साम्यताम्।
संवत्सरं किञ्चिदूनं दित्या यद्धरिरर्चितः॥ ६६
इसमें तनिक भी आश्चर्यकी बात नहीं है। क्योंकि जो मनुष्य एक बार भी आदि पुरुष भगवान् नारायणकी आराधना कर लेता है, वह उनकी समानता प्राप्त कर लेता है; फिर दितिने तो कुछ ही दिन कम एक वर्षतक भगवान्की आराधना की थी॥ ६६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.18.66 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 799) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/18/66/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)