श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.18.66

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

सकृदिष्ट्वाऽऽदिपुरुषं पुरुषो याति साम्यताम्।

संवत्सरं किञ्चिदूनं दित्या यद्धरिरर्चितः॥ ६६

sakṛdiṣṭvā''dipuruṣaṃ puruṣo yāti sāmyatām|

saṃvatsaraṃ kiñcidūnaṃ dityā yaddharirarcitaḥ|| 66

अर्थ

इसमें तनिक भी आश्‍चर्यकी बात नहीं है। क्योंकि जो मनुष्य एक बार भी आदि पुरुष भगवान् नारायणकी आराधना कर लेता है, वह उनकी समानता प्राप्त कर लेता है; फिर दितिने तो कुछ ही दिन कम एक वर्षतक भगवान्‌की आराधना की थी॥ ६६॥✎ 553

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #553 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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