श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.18.67

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

सजूरिन्द्रेण पञ्चाशद्देवास्ते मरुतोऽभवन्।

व्यपोह्य मातृदोषं ते हरिणा सोमपाः कृताः॥ ६७

sajūrindreṇa pañcāśaddevāste maruto'bhavan|

vyapohya mātṛdoṣaṃ te hariṇā somapāḥ kṛtāḥ|| 67

अर्थ

अब वे उनचास मरुद्गण इन्द्रके साथ मिलकर पचास हो गये। इन्द्रने भी सौतेली माताके पुत्रोंके साथ शत्रुभाव न रखकर उन्हें सोमपायी देवता बना लिया॥ ६७॥✎ 553

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #553 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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