विभिन्न देवताओंके रूपमें नाम और रूपके भेदसे उन्हींकी कल्पना हुई है। सभी पुरुष—चाहे किसी भी देवताकी उपासना करें—उन्हींकी उपासना करते हैं। ठीक वैसे ही स्त्रियोंके लिये भगवान्ने पतिका रूप धारण किया है। वे उनकी उसी रूपमें पूजा करती हैं॥ ३४॥✎ 551
स एव देवतालिङ्गैर्नामरूपविकल्पितैः।
इज्यते भगवान् पुम्भिः स्त्रीभिश्च पतिरूपधृक्॥ ३४
विभिन्न देवताओंके रूपमें नाम और रूपके भेदसे उन्हींकी कल्पना हुई है। सभी पुरुष—चाहे किसी भी देवताकी उपासना करें—उन्हींकी उपासना करते हैं। ठीक वैसे ही स्त्रियोंके लिये भगवान्ने पतिका रूप धारण किया है। वे उनकी उसी रूपमें पूजा करती हैं॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.18.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 795) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/18/34/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)