श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.18.35

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

तस्मात्पतिव्रता नार्यः श्रेयस्कामाः सुमध्यमे।

यजन्तेऽनन्यभावेन पतिमात्मानमीश्‍वरम्॥ ३५

tasmātpativratā nāryaḥ śreyaskāmāḥ sumadhyame|

yajante'nanyabhāvena patimātmānamīśvaram|| 35

अर्थ

इसलिये प्रिये! अपना कल्याण चाहनेवाली पतिव्रता स्त्रियाँ अनन्य प्रेमभावसे अपने पतिदेवकी ही पूजा करती हैं; क्योंकि पतिदेव ही उनके परम प्रियतम आत्मा और ईश्‍वर हैं॥ ३५॥✎ 551

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #551 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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