इसलिये प्रिये! अपना कल्याण चाहनेवाली पतिव्रता स्त्रियाँ अनन्य प्रेमभावसे अपने पतिदेवकी ही पूजा करती हैं; क्योंकि पतिदेव ही उनके परम प्रियतम आत्मा और ईश्वर हैं॥ ३५॥✎ 551
तस्मात्पतिव्रता नार्यः श्रेयस्कामाः सुमध्यमे।
यजन्तेऽनन्यभावेन पतिमात्मानमीश्वरम्॥ ३५
इसलिये प्रिये! अपना कल्याण चाहनेवाली पतिव्रता स्त्रियाँ अनन्य प्रेमभावसे अपने पतिदेवकी ही पूजा करती हैं; क्योंकि पतिदेव ही उनके परम प्रियतम आत्मा और ईश्वर हैं॥ ३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.18.35 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 795) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/18/35/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)