श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.18.13

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

संह्रादं प्रागनुह्रादं ह्रादं१ प्रह्रादमेव च।

तत्स्वसा सिंहिका नाम राहुं विप्रचितोऽग्रहीत्॥ १३

saṃhrādaṃ prāganuhrādaṃ hrādaṃ prahrādameva ca|

tatsvasā siṃhikā nāma rāhuṃ vipracito'grahīt|| 13

अर्थ

हिरण्यकशिपुकी पत्‍नी दानवी कयाधु थी। उसके पिता जम्भने उसका विवाह हिरण्यकशिपुसे कर दिया था। कयाधुके चार पुत्र हुए—संह्राद, अनुह्राद, ह्राद और प्रह्राद। इनकी सिंहिका नामकी एक बहिन भी थी। उसका विवाह विप्रचित्ति नामक दानवसे हुआ। उससे राहु नामक पुत्रकी उत्पत्ति हुई॥ १२-१३॥✎ 550

यह अर्थ श्लोक 12–13 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—प्रह्लादं ह्लादमेव च।

    (मुद्रित पृष्ठ 793)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #550 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें