श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.18.14

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

शिरोऽहरद्यस्य हरिश्‍चक्रेण पिबतोऽमृतम्।

संह्रादस्य कृ२तिर्भार्यासूत पञ्चजनं ततः॥ १४

śiro'haradyasya hariścakreṇa pibato'mṛtam|

saṃhrādasya kṛtirbhāryāsūta pañcajanaṃ tataḥ|| 14

अर्थ

यह वही राहु है, जिसका सिर अमृतपानके समय मोहिनीरूपधारी भगवान्‌ने चक्रसे काट लिया था। संह्रादकी पत्‍नी थी कृति। उससे पंचजन नामक पुत्र उत्पन्‍न हुआ॥ १४॥✎ 550

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—सती।

    (मुद्रित पृष्ठ 793)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #550 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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