जिनके पास ज्ञान और वैराग्यका बल है और जो भगवान् वासुदेवके चरणोंमें भक्तिभाव रखते हैं, उनके लिये इस जगत्में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जिसे वे हेय या उपादेय समझकर राग-द्वेष करें॥ ३१॥✎ 546547548
वासुदेवे भगवति भक्तिमुद्वहतां नृणाम्।
ज्ञानवैराग्यवीर्याणां नेह कश्चिद् व्यपाश्रयः॥ ३१
जिनके पास ज्ञान और वैराग्यका बल है और जो भगवान् वासुदेवके चरणोंमें भक्तिभाव रखते हैं, उनके लिये इस जगत्में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जिसे वे हेय या उपादेय समझकर राग-द्वेष करें॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.17.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 790) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/17/31/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)