श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.17.30

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

अविवेककृतः पुंसो ह्यर्थभेद इवात्मनि।

गुणदोषविकल्पश्‍च भिदेव स्रजिवत्कृतः॥ ३०

avivekakṛtaḥ puṃso hyarthabheda ivātmani|

guṇadoṣavikalpaśca bhideva srajivatkṛtaḥ|| 30

अर्थ

जैसे स्वप्नमें भेद-भ्रमसे सुख-दुःख आदिकी प्रतीति होती है और जाग्रत्-अवस्थामें भ्रमवश मालामें ही सर्पबुद्धि हो जाती है—वैसे ही मनुष्य अज्ञानवश आत्मामें देवता, मनुष्य आदिका भेद तथा गुण-दोष आदिकी कल्पना कर लेता है॥ ३०॥✎ 546 547 548

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #546 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #547 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #548 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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