श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.17.32

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

नाहं विरिञ्चो न कुमारनारदौ

न ब्रह्मपुत्रा मुनयः सुरेशाः।

विदाम यस्येहितमंशकांशका

न तत्स्वरूपं पृथगीशमानिनः॥ ३२

nāhaṃ viriñco na kumāranāradau

na brahmaputrā munayaḥ sureśāḥ|

vidāma yasyehitamaṃśakāṃśakā

na tatsvarūpaṃ pṛthagīśamāninaḥ|| 32

अर्थ

मैं, ब्रह्माजी, सनकादि, नारद, ब्रह्माजीके पुत्र भृगु आदि मुनि और बड़े-बड़े देवता—कोई भी भगवान्‌की लीलाका रहस्य नहीं जान पाते। ऐसी अवस्थामें जो उनके नन्हे-से-नन्हे अंश हैं और अपनेको उनसे अलग ईश्‍वर मान बैठे हैं, वे उनके स्वरूपको जान ही कैसे सकते हैं?॥ ३२॥✎ 546 547 548

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #546 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #547 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #548 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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