yāvadyatropalabhyeta tāvatsvatvaṃ hi tasya tat || 8
अर्थ
जीव नित्य और अहंकाररहित है। वह गर्भमें आकर जबतक जिस शरीरमें रहता है, तभीतक उस शरीरको अपना समझता है॥ ८॥
एवं योनिगतो जीवः स नित्यो निरहङ्कृतः।
यावद्यत्रोपलभ्येत तावत्स्वत्वं हि तस्य तत् ॥ ८
जीव नित्य और अहंकाररहित है। वह गर्भमें आकर जबतक जिस शरीरमें रहता है, तभीतक उस शरीरको अपना समझता है॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.16.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 779) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/16/8/