॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 6.16.9
एष नित्योऽव्ययः सूक्ष्म एष सर्वाश्रयः स्वदृक्।
आत्ममायागुणैर्विश्वमात्मानं सृजति प्रभुः॥ ९
eṣa nityo'vyayaḥ sūkṣma eṣa sarvāśrayaḥ svadṛk|
ātmamāyāguṇairviśvamātmānaṃ sṛjati prabhuḥ|| 9
अर्थ
यह जीव नित्य अविनाशी, सूक्ष्म (जन्मादिरहित), सबका आश्रय और स्वयंप्रकाश है। इसमें स्वरूपतः जन्म-मृत्यु आदि कुछ भी नहीं हैं। फिर भी यह ईश्वररूप होनेके कारण अपनी मायाके गुणोंसे ही अपने-आपको विश्वके रूपमें प्रकट कर देता है॥ ९॥