श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.7

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

नित्यस्यार्थस्य सम्बन्धो ह्यनित्यो दृश्यते नृषु।

यावद्यस्य हि सम्बन्धो ममत्वं तावदेव हि॥ ७

nityasyārthasya sambandho hyanityo dṛśyate nṛṣu|

yāvadyasya hi sambandho mamatvaṃ tāvadeva hi|| 7

अर्थ

इस प्रकार विचार करनेसे पता लगता है कि मनुष्योंकी अपेक्षा अधिक दिन ठहरनेवाले सुवर्ण आदि पदार्थोंका सम्बन्ध भी मनुष्योंके साथ स्थायी नहीं, क्षणिक ही होता है; और जबतक जिसका जिस वस्तुसे सम्बन्ध रहता है, तभीतक उसकी उस वस्तुसे ममता भी रहती है॥ ७॥

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