श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.47

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

नमस्तुभ्यं भगवते

सकलजगत्स्थितिलयोदयेशाय ।

दुरवसितात्मगतये

कुयोगिनां भिदा परमहंसाय॥ ४७

namastubhyaṃ bhagavate

sakalajagatsthitilayodayeśāya |

duravasitātmagataye

kuyogināṃ bhidā paramahaṃsāya|| 47

अर्थ

भगवन्! आपकी ही अध्यक्षतामें सारे जगत‍्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होते हैं। कुयोगीजन भेददृष्टिके कारण आपका वास्तविक स्वरूप नहीं जान पाते। आपका स्वरूप वास्तवमें अत्यन्त शुद्ध है। मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ ४७॥✎ 543

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #543 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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