हे अनन्त! आप सम्पूर्ण जगत्के आत्मा हैं। अतएव संसारमें प्राणी जो कुछ करते हैं, वह सब आप जानते ही रहते हैं। इसलिये जैसे जुगनू सूर्यको प्रकाशित नहीं कर सकता, वैसे ही परमगुरु आपसे मैं क्या निवेदन करूँ॥ ४६॥✎ 543
विदितमनन्त समस्तं
तव जगदात्मनो जनैरिहाचरितम्।
विज्ञाप्यं परमगुरोः
कियदिव सवितुरिव खद्योतैः॥ ४६
हे अनन्त! आप सम्पूर्ण जगत्के आत्मा हैं। अतएव संसारमें प्राणी जो कुछ करते हैं, वह सब आप जानते ही रहते हैं। इसलिये जैसे जुगनू सूर्यको प्रकाशित नहीं कर सकता, वैसे ही परमगुरु आपसे मैं क्या निवेदन करूँ॥ ४६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 6.16.46 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 784) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/6/16/46/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)