श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.48

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

यं वै श्‍वसन्तमनु विश्‍वसृजः श्‍वसन्ति

यं चेकितानमनु चित्तय उच्चकन्ति।

भूमण्डलं सर्षपायति यस्य मूर्ध्नि

तस्मै नमो भगवतेऽस्तु सहस्रमूर्ध्ने॥ ४८

yaṃ vai śvasantamanu viśvasṛjaḥ śvasanti

yaṃ cekitānamanu cittaya uccakanti|

bhūmaṇḍalaṃ sarṣapāyati yasya mūrdhni

tasmai namo bhagavate'stu sahasramūrdhne|| 48

अर्थ

आपकी चेष्टासे शक्ति प्राप्त करके ही ब्रह्मा आदि लोकपालगण चेष्टा करनेमें समर्थ होते हैं। आपकी दृष्टिसे जीवित होकर ही ज्ञानेन्द्रियाँ अपने-अपने विषयोंको ग्रहण करनेमें समर्थ होती हैं। यह भूमण्डल आपके सिरपर सरसोंके दानेके समान जान पड़ता है। मैं आप सहस्रशीर्षा भगवान्‌को बार-बार नमस्कार करता हूँ॥ ४८॥✎ 543

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #543 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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