श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.16.26

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

भक्तायैतां प्रपन्‍नाय विद्यामादिश्य नारदः।

ययावङ्गिरसा साकं धाम स्वायम्भुवं प्रभो॥ २६

bhaktāyaitāṃ prapannāya vidyāmādiśya nāradaḥ|

yayāvaṅgirasā sākaṃ dhāma svāyambhuvaṃ prabho|| 26

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! देवर्षि नारद अपने शरणागत भक्त चित्रकेतुको इस विद्याका उपदेश करके महर्षि अंगिराके साथ ब्रह्मलोकको चले गये॥ २६॥

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