श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.37

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

इत्युक्ते यमदूतैस्तैर्वासुदेवोक्तकारिणः।

तान् प्रत्यूचुः प्रहस्येदं मेघनिर्ह्रादया गिरा॥ ३७✎ 1068

ityukte yamadūtaistairvāsudevoktakāriṇaḥ|

tān pratyūcuḥ prahasyedaṃ meghanirhrādayā girā|| 37

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जब यमदूतोंने इस प्रकार कहा, तब भगवान् नारायणके आज्ञाकारी पार्षदोंने हँसकर मेघके समान गम्भीर वाणीसे उनके प्रति यों कहा—॥ ३७॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1068 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मेघनिर्हृदया → मेघनिर्ह्रादया

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