श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.36

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

दिशो वितिमिरालोकाः कुर्वन्तः स्वेन रोचिषा।

किमर्थं धर्मपालस्य किङ्करान्‍नो निषेधथ॥ ३६

diśo vitimirālokāḥ kurvantaḥ svena rociṣā|

kimarthaṃ dharmapālasya kiṅkarānno niṣedhatha|| 36

अर्थ

तुमलोगोंकी अंगकान्तिसे दिशाओंका अन्धकार और प्राकृत प्रकाश भी दूर हो रहा है। हम धर्मराजके सेवक हैं। हमें तुमलोग क्यों रोक रहे हो?’॥ ३६॥

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