श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.18

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

प्रायश्चित्तानि चीर्णानि नारायणपराङ्मुखम्।

न निष्पुनन्ति राजेन्द्र सुराकुम्भमिवापगाः॥ १८

prāyaścittāni cīrṇāni nārāyaṇaparāṅmukham|

na niṣpunanti rājendra surākumbhamivāpagāḥ|| 18

अर्थ

परीक्षित्! जैसे शराबसे भरे घड़ेको नदियाँ पवित्र नहीं कर सकतीं, वैसे ही बड़े-बड़े प्रायश्चित्त बार-बार किये जानेपर भी भगवद्विमुख मनुष्यको पवित्र करनेमें असमर्थ हैं॥ १८॥✎ 494

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #494 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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