श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 6.1.19

षष्ठ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

सकृन्मनः कृष्णपदारविन्दयो-

र्निवेशितं तद‍्गुणरागि यैरिह।

न ते यमं पाशभृतश्‍च तद्भटान्

स्वप्नेऽपि पश्यन्ति हि चीर्णनिष्कृताः॥ १९

sakṛnmanaḥ kṛṣṇapadāravindayo-

rniveśitaṃ tadguṇarāgi yairiha|

na te yamaṃ pāśabhṛtaśca tadbhaṭān

svapne'pi paśyanti hi cīrṇaniṣkṛtāḥ|| 19

अर्थ

जिन्होंने अपने भगवद‍्गुणानुरागी मन-मधुकरको भगवान् श्रीकृष्णके चरणारविन्द-मकरन्दका एक बार पान करा दिया, उन्होंने सारे प्रायश्चित्त कर लिये। वे स्वप्नमें भी यमराज और उनके पाशधारी दूतोंको नहीं देखते। फिर नरककी तो बात ही क्या है॥ १९॥✎ 494

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #494 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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