श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! महाराज भरत बड़े ही भगवद्भक्त थे। भगवान् ऋषभदेवने अपने संकल्पमात्रसे उन्हें पृथ्वीकी रक्षा करनेके लिये नियुक्त कर दिया। उन्होंने उनकी आज्ञामें स्थित रहकर विश्वरूपकी कन्या पंचजनीसे विवाह किया॥ १॥
भरतस्तु महाभागवतो यदा भगवतावनितलपरिपालनाय सञ्चिन्तितस्तदनुशासनपरः पञ्चजनीं विश्वरूपदुहितरमुपयेमे॥ १॥
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! महाराज भरत बड़े ही भगवद्भक्त थे। भगवान् ऋषभदेवने अपने संकल्पमात्रसे उन्हें पृथ्वीकी रक्षा करनेके लिये नियुक्त कर दिया। उन्होंने उनकी आज्ञामें स्थित रहकर विश्वरूपकी कन्या पंचजनीसे विवाह किया॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.7.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 603) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/7/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1050 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): संञ्चिन्तितस्तदनुशासनपर: → सञ्चिन्तितस्तदनुशासनपरः