श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.6.19

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

नित्यानुभूतनिजलाभनिवृत्ततृष्णः

श्रेयस्यतद्रचनया चिरसुप्तबुद्धेः।

लोकस्य यः करुणयाभयमात्मलोक-

माख्यान्‍नमो भगवते ऋषभाय तस्मै॥ १९

nityānubhūtanijalābhanivṛttatṛṣṇaḥ

śreyasyatadracanayā cirasuptabuddheḥ|

lokasya yaḥ karuṇayābhayamātmaloka-

mākhyānnamo bhagavate ṛṣabhāya tasmai|| 19

अर्थ

निरन्तर विषय-भोगोंकी अभिलाषा करनेके कारण अपने वास्तविक श्रेयसे चिरकालतक बेसुध हुए लोगोंको जिन्होंने करुणावश निर्भय आत्मलोकका उपदेश दिया और जो स्वयं निरन्तर अनुभव होनेवाले आत्मस्वरूपकी प्राप्तिसे सब प्रकारकी तृष्णाओंसे मुक्त थे, उन भगवान् ऋषभदेवको नमस्कार है॥ १९॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे ऋषभदेवानुचरिते षष्ठोऽध्यायः॥ ६॥✎ 1960

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