श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.5.9

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

यदा मनोहृदयग्रन्थिरस्य

कर्मानुबद्धो दृढ आश्लथेत।

तदा जनः सम्परिवर्ततेऽस्मा-

न्मुक्तः परं यात्यतिहाय हेतुम्॥ ९

yadā manohṛdayagranthirasya

karmānubaddho dṛḍha āślatheta|

tadā janaḥ samparivartate'smā-

nmuktaḥ paraṃ yātyatihāya hetum|| 9

अर्थ

जिस समय कर्मवासनाओंके कारण पड़ी हुई इसकी यह दृढ़ हृदय-ग्रन्थि ढीली हो जाती है, उसी समय यह दाम्पत्यभावसे निवृत्त हो जाता है और संसारके हेतुभूत अहंकारको त्यागकर सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो परमपद प्राप्त कर लेता है॥ ९॥✎ 441 1351

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #441 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #1351 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): योग-साधनसे → योगसाधनसे

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