श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.5.10

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

हंसे गुरौ मयि भक्‍त्यानुवृत्या

वितृष्णया द्वन्द्वतितिक्षया च।

सर्वत्र जन्तोर्व्यसनावगत्या

जिज्ञासया तपसेहानिवृत्त्या॥ १०

haṃse gurau mayi bhaktyānuvṛtyā

vitṛṣṇayā dvandvatitikṣayā ca|

sarvatra jantorvyasanāvagatyā

jijñāsayā tapasehānivṛttyā|| 10

अर्थ

पुत्रो! संसारसागरसे पार होनेमें कुशल तथा धैर्य, उद्यम एवं सत्त्वगुणविशिष्ट पुरुषको चाहिये कि सबके आत्मा और गुरुस्वरूप मुझ भगवान्‌में भक्तिभाव रखनेसे, मेरे परायण रहनेसे, तृष्णाके त्यागसे, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंके सहनेसे ‘जीवको सभी योनियोंमें दुःख ही उठाना पड़ता है’ इस विचारसे, तत्त्वजिज्ञासासे, तपसे, सकाम कर्मके त्यागसे, मेरे ही लिये कर्म करनेसे, मेरी कथाओंका नित्यप्रति श्रवण करनेसे, मेरे भक्तोंके संग और मेरे गुणोंके कीर्तनसे, वैरत्यागसे, समतासे, शान्तिसे और शरीर तथा घर आदिमें मैं-मेरेपनके भावको त्यागनेकी इच्छासे, अध्यात्मशास्त्रके अनुशीलनसे, एकान्त-सेवनसे, प्राण, इन्द्रिय और मनके संयमसे, शास्त्र और सत्पुरुषोंके वचनमें यथार्थ बुद्धि रखनेसे, पूर्ण ब्रह्मचर्यसे, कर्तव्यकर्मोंमें निरन्तर सावधान रहनेसे, वाणीके संयमसे, सर्वत्र मेरी ही सत्ता देखनेसे, अनुभवज्ञानसहित तत्त्वविचारसे और योगसाधनसे अहंकाररूप अपने लिंगशरीरको लीन कर दे॥ १०—१३॥✎ 441 1351

यह अर्थ श्लोक 10–13 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #441 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में
  • #1351 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): योग-साधनसे → योगसाधनसे

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें