महाराज नाभिके समान ब्राह्मणभक्त भी कौन हो सकता है—जिनकी दक्षिणादिसे सन्तुष्ट हुए ब्राह्मणोंने अपने मन्त्रबलसे उन्हें यज्ञशालामें साक्षात् श्रीविष्णुभगवान्के दर्शन करा दिये॥ ७॥
ब्रह्मण्योऽन्यः कुतो नाभेर्विप्रा मङ्गलपूजिताः।
यस्य बर्हिषि यज्ञेशं दर्शयामासुरोजसा॥ ७
महाराज नाभिके समान ब्राह्मणभक्त भी कौन हो सकता है—जिनकी दक्षिणादिसे सन्तुष्ट हुए ब्राह्मणोंने अपने मन्त्रबलसे उन्हें यज्ञशालामें साक्षात् श्रीविष्णुभगवान्के दर्शन करा दिये॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.4.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 591) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/4/7/