श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.4.8

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

अथ ह भगवानृषभदेवः५ स्ववर्षं कर्मक्षेत्रमनुमन्यमानः प्रदर्शितगुरुकुलवासो लब्धवरैर्गुरुभिरनुज्ञातो गृहमेधिनां धर्माननुशिक्षमाणो जयन्त्यामिन्द्रदत्तायामुभयलक्षणं कर्म समाम्नायाम्नातमभियुञ्जन्‍नात्मजानामात्मसमानानां शतं जनयामास॥ ८॥

atha ha bhagavānṛṣabhadevaḥ svavarṣaṃ karmakṣetramanumanyamānaḥ pradarśitagurukulavāso labdhavarairgurubhiranujñāto gṛhamedhināṃ dharmānanuśikṣamāṇo jayantyāmindradattāyāmubhayalakṣaṇaṃ karma samāmnāyāmnātamabhiyuñjannātmajānāmātmasamānānāṃ śataṃ janayāmāsa|| 8||

अर्थ

भगवान् ऋषभदेवने अपने देश अजनाभखण्डको कर्मभूमि मानकर लोकसंग्रहके लिये कुछ काल गुरुकुलमें वास किया। गुरुदेवको यथोचित दक्षिणा देकर गृहस्थमें प्रवेश करनेके लिये उनकी आज्ञा ली। फिर लोगोंको गृहस्थधर्मकी शिक्षा देनेके लिये देवराज इन्द्रकी दी हुई उनकी कन्या जयन्तीसे विवाह किया तथा श्रौत-स्मार्त्त दोनों प्रकारके शास्त्रोपदिष्ट कर्मोंका आचरण करते हुए उसके गर्भसे अपने ही समान गुणवाले सौ पुत्र उत्पन्‍न किये॥ ८॥

टिप्पणियाँ

  1. ५

    प्रा पा—भगवानृषभः स्व।

    (मुद्रित पृष्ठ 591)

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