॥ श्रीहरिः ॥
यस्य३ ह पाण्डवेय श्लोकावुदाहरन्ति—
को४ नु तत्कर्म राजर्षेर्नाभेरन्वाचरेत्पुमान्।
अपत्यतामगाद्यस्य हरिः शुद्धेन कर्मणा॥ ६
yasya ha pāṇḍaveya ślokāvudāharanti—
ko nu tatkarma rājarṣernābheranvācaretpumān|
apatyatāmagādyasya hariḥ śuddhena karmaṇā|| 6
अर्थ
पाण्डुनन्दन! राजा नाभिके विषयमें यह लोकोक्ति प्रसिद्ध है—✎ 439
यस्य ह पाण्डवेय श्लोकावुदाहरन्ति—
को नु तत्कर्म राजर्षेर्नाभेरन्वाचरेत्पुमान्।
अपत्यतामगाद्यस्य हरिः शुद्धेन कर्मणा॥ ६
पाण्डुनन्दन! राजा नाभिके विषयमें यह लोकोक्ति प्रसिद्ध है—
श्रीमद्भागवत महापुराण 5.4.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 591) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/5/4/6/टिप्पणियाँ
- ३
प्रा० पा०—यत्र।
(मुद्रित पृष्ठ 591) - ४
प्रा० पा०—कस्तत्कर्म।
(मुद्रित पृष्ठ 591)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #439 शब्दोंके बीचका स्थान: लोकोक्तिप्रसिद्ध → लोकोक्ति प्रसिद्ध