श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 5.2.23

पञ्चम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

सा सूत्वाथ सुतान्‍नवानुवत्सरं गृह एवापहाय पूर्वचित्तिर्भूय एवाजं देवमुपतस्थे॥ २०॥ आग्नीध्रसुतास्ते मातुरनुग्रहादौत्पत्तिकेनैव संहननबलोपेताः पित्रा विभक्ता आत्मतुल्यनामानि यथाभागं जम्बूद्वीपवर्षाणि बुभुजुः॥ २१॥ आग्नीध्रो राजातृप्तः कामानामप्सरसमेवानुदिनमधिमन्यमानस्तस्याः सलोकतां श्रुतिभिरवारुन्ध यत्र पितरो मादयन्ते॥ २२॥ सम्परेते पितरि नव भ्रातरो मेरुदुहितॄर्मेरुदेवीं प्रतिरूपामुग्रदंष्ट्रीं लतां रम्यां श्यामां नारीं भद्रां देववीतिमितिसंज्ञा नवोदवहन्॥ २३॥✎ 1045

samparete pitari nava bhrātaro meruduhitṝrmerudevīṃ pratirūpāmugradaṃṣṭrīṃ latāṃ ramyāṃ śyāmāṃ nārīṃ bhadrāṃ devavītimitisaṃjñā navodavahan|| 23||

अर्थ

पिताके परलोक सिधारनेपर नाभि आदि नौ भाइयोंने मेरुकी मेरुदेवी, प्रतिरूपा, उग्रदंष्ट्री, लता, रम्या, श्यामा, नारी, भद्रा और देववीति नामकी नौ कन्याओंसे विवाह किया॥ २३॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे आग्नीध्रवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1045 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मेरुदुहितृर्मेरुदेवीं → मेरुदुहितॄर्मेरुदेवीं

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